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विश्व डाक दिवस पर यादों की चिट्ठी आई है-विक्रांत राय,
October 9, 2020 • Aankhen crime par • मध्यप्रदेश

विश्व डाक दिवस पर यादों की चिट्ठी आई है-विक्रांत राय,                  

  होशंगाबाद- चिट्ठी-पाती जिन लिखो, गए बहुत दिन बीत, अब दुनिया की रीत है मुंह देखे की प्रीत, घर-घर की दुलारी चिट्ठी का अब कोई ठिकाना न रहा। उसके इंतज़ार करने वाले भी लगभग अब नहीं रहे। उस दौर को आंखों से देखने वाले और महसूस करने वाले हम आखिरी पीढ़ी के गवाह हैं। चिट्ठी लिखने वाले, पाने वाले, लाने वाले के साथ-साथ चिट्ठी वाचक का स्थान हुआ करता था। हमारे गांव में कोई पोस्ट ऑफिस नहीं था। बारधा से कल्याण सिंह राजपूत साइकिल से आकर चिट्ठी बांट जाया करते थे। हर बात में उनका तकिया कलाम होता था मां कसम, अन्न कसम। बस इन्हीं शब्दों के सहारे वो चिट्ठियों के साथ अपना प्रेम बांट जाते थे। वो अकसर हमारी दालान में आकर बैठ जाते और जमाने भर की चर्चाएं सुना जाया करते। आज डाक दिवस पर बरबस ही उनकी याद आ गई। कितने साल बीत गए चिट्ठी का दौर क्या गया उनकी खैर-खबर ही नहीं मिली है। पर आज यादों के पन्नों में वो महक फिर महसूस हुई जो मुझे वापस ले गई गुजरे हुए जमाने में। कितना शांत जीवन था, लगभग अपेक्षा रहित केवल जीने की ललक का माहौल। खैर भटकना नहीं है बात चिट्ठी के इर्द-गिर्द रहे तो बेहतर है। जिसके घर का कोई सदस्य बाहर रहता था तो उसे डाकिया, चिट्ठी और तार का जो इंतज़ार रहता था वो प्रेम और वियोग का अथाह सागर था। उसकी गहराई को वही नाप सकता है जिसने वो दौर देखा होगा। कुछ पलों की यात्रा मैं करवाता हूँ।...बहुत कम पढ़े-लिखे लोग हुआ करते थे गांव में। अच्छे- पढ़े लिखे लोगों में मेरे स्वर्गीय चाचा मुंशीलाल की गिनती हुआ करती थी। ट्यूशन पढ़ाने के अलावा वो दालान में बैठे-बैठे राम-नाम लेखन और चित्रकारी वगैरह करते रहते थे। उनके पास कई लोग अपनी चिट्ठियां, सरकारी आवेदन वगैरह लिखवाने आते थे। कुछ लोग चिट्ठियां लेकर पढ़कर सुनाने की तमन्ना से भी आते थे। कुछ ही सालों में मेरे देखते-देखते यह सिलसिला चल बसा, क्योंकि चिट्ठियों का दौर अपने अंतिम समय गिन रहा था। इसी बीच उस जमाने को देखने का सौभाग्य मिल गया। चिट्ठियों का महत्व भी पता चला। मेरे चाचा भी अपनी संदूक में बहुत सारे पत्र रखते थे जो उनके वार्तालाप से संबंधित रहते थे। लगभग सभी घरों में लोग सालों तक पूंजी की तरह संभाल कर रखते थे। कुछ दोस्तों वगैरह को मैंने भी चिट्ठियां लिखी और उनके जवाब भी आये। बहुत सुखद अनुभव और मीठी यादों का पिटारा है वो समय। अब तो सबके पास अलग-अलग मोबाइल हैं। इसलिए पर्सनल मैसेज का आदान प्रदान होता है। लेकिन पहले तो एक ही चिट्ठी आती थी पूरे परिवार के लिए। अगर बेटा बाहर है तो, पिताजी, माताजी, बड़े भाई, छोटे भाई, बड़ी बहन, छोटी बहन, चाचा-चाची, पत्नी, भाभी और बच्चों का अलग-अलग आदर और प्रेम चिट्ठी की गठरी में बंधकर आता था। यही परिवार के आपसी प्रेम की कल्पना को उजागर करने की मोहर होती थी। आदरणीय, पूज्य पिताजी, पूजनीय माताजी, प्रिय आदि शब्दों का सम्बोधन ऐसा होता था कि प्रियजन खुद ही यह सब बोल रहा है। इससे एक-दूसरे के प्रति लगाव का एहसास भी होता था। चिट्ठी (ख़त) परिवार को बांधने का भी सहारा थे। अब मोबाइल के संदेशों ने सबको अकेला कर दिया। नई पीढ़ी उस एहसास से महरूम हो चुकी है। पैसों के आदान-प्रदान का तरीका भी मनीऑर्डर तक सीमित था। अर्जेंट सूचनाएं भी डाक तारों से पहुंचती थी। मोबाइल ने दूरी घटाई भी है और बढ़ाई भी है। अंग्रेजों का डाक विभाग ऐसा विभाग माना जाता है जो देश के अनपढ़, साक्षर, अमीर-गरीब सारे तबकों को संतुष्ट कर भावनाओं को जोड़ने वाला कहा जा सकता है। जो लोग वो दौर देखने से वंचित रह गए हैं वो हिंदी फिल्में देखकर उस स्वर्णकाल को छू सकते हैं। फ़िल्म निर्माताओं और कलाकारों ने बहुत ही संजीदगी से उस दौर को कैनवास पर कलाकारी की कुची से उकेरा है। अब डाकिया, डाक बाबू, डाकबंगला, चिट्ठी, पत्र, खत, तार, मनीऑर्डर सब शब्द खो गए। वो लाल डिब्बे भी अब नहीं दिखते जिनमें चिट्ठियां गोता लगाकर वक्त की लहरों से गुजरती हुई गंतव्य तक पहुंचती थीं। नई पीढ़ी का शायद ही कोई बच्चा उस डिब्बे के नजदीक पहुंचा हो। कोरियर वालों ने हाथ-पैर जो बांध दिए हैं। चिट्ठी पाने की बेकरारी और लम्हें-लम्हें का इंतजार अभी भी उसे फिल्मों में उसी रूप में देखा जा सकता है। पांच मिनट का गाना काफी है उसे समझने के लिए।... डाकिया डाक लाया, डाकिया डाक लाया।... चिट्ठी आई है, आई है, चिट्ठी आई है।... हमने सनम को खत लिखा खत में लिखा, डाकिए ने ये कहा कोई शहर इस नाम का कोई गली इस नाम की।... चिठ्टीय पंख लगा के उड़ जा गैर के हथ न आवी।...आएगी जरूर चिट्ठी मेरे नाम की, सब देखना...एक चिट्ठी मिली है मुझे प्यार की जिसमें खुशबू बसी है मेरे प्यार की... फूल तुम्हें भेजा है खत में।...कबूतर जा, जा, कबूतर जा, पहले प्यार की पहली चिट्ठी साजन को दे आया...प्यार के कागज पे दिल की कलम से।... चिट्ठी न कोई संदेश जाने वो कौन सा देश जहां तुम चले गए।....चिट्ठी, डाकिया और डाक वास्तव में जीवन के अंग थे। चिट्ठी के शब्द लोगों की पूंजी हुआ करते थे। जो लिखने वाले और पढ़ने वाले के दिलों पर स्वर्ण अक्षरों से मुद्रित हो जाते थे। उस अमिट स्याही का दौर आधुनिकता एक तरह से लील गई। जीवन चलने का नाम है, परिवर्तन का दूसरा नाम है। जिन्होंने उस जीवन को देखा ठीक है जो न देख पाए वो वर्तमान का आनंद लें, क्योंकि कुछ साल बाद यह भी नहीं रहेगा।                                   प्रदीप गुप्ता की रिपोर्ट