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कोसा से  रेशम धागा निकालने के लिए लाखों रुपए लागत से परियोजना मद से खरीदी गई
September 18, 2020 • Aankhen crime par • छतीसगढ़,उड़ीसा

रामानुजगंज(नवनीत पांडेय) कोसा से  रेशम धागा निकालने के लिए लाखों रुपए लागत से परियोजना मद से खरीदी गई 16 रिलिंग मशीन जो ग्राम पंचायत पिपरोल के महिला स्वयं सहायता समूह की महिलाओं को दी गई थी परन्तु रिलिंग मशीन के खराबी के कारण इसका एक दिन भी उपयोग नहीं हो पाया एवं यह कबाड़ के रूप में अब तक तब्दील हो गई जिन्हें ढाई साल तक स्वयं सहायता समूह की महिलाओं के घरों में रखा गया था जिसे 6 माह पूर्व कोसा  बीज केंद्र आरागाही ले आया गया।

                                   बलरामपुर रामानुजगंज जिला गठन के बाद जिले में रेशम धागे निकल सके इसके लिए परियोजना मद से 16 रिलिंग मशीन से खरीदी गई जिसे खरीद कर ग्राम पंचायत पीपरोल के स्वयं सहायता समूह के महिलाओं को दी गई परंतु इसका उपयोग 1 दिन भी मशीन के खराबी के कारण नहीं हो पाया जिस कारण यह मात्र शोपीस में रह गया था जो विगत ढाई साल से स्वयं सहायता समूह के महिलाओं के घर में था जिसे 6 माह पूर्व कोसा बीज केंद्र आरागाही ले आया गया।


एक माह का दिया गया था प्रशिक्षण- स्वयं सहायता समूह के महिलाओं को रिलिंग मशीन देने के बाद रिलिंग मशीन का कैसे उपयोग करना है इसके लिए एक माह का प्रशिक्षण दिया गया था परंतु प्रशिक्षक ने भी मशीन के खराब होने की बात कही थी परंतु इसे ठीक करने की आज तक पहल नहीं की गई जिससे यह कबाड़ में तब्दील हो गया।


दर्जनों लोगों को मिलता रोजगार- परियोजना मद से खरीदी गई रिलिंग मशीन का यदि उपयोग होता तो इससे दर्जनों लोगों को रोजगार का साधन मुहैया होता। महिलाएं खाली समय में इसका उपयोग अतिरिक्त आय के साधन प्राप्त करने के लिए कर सकती थी।


रेशम का धागा 4000 से लेकर ₹4500 किलो तक बिकता है- यदि कोसा से यहां रेशम धागा का उत्पादन होता तो यह धागा ₹4000 किलो से ₹4500 किलो तक बिकता जिससे आमदनी प्राप्त होती।


रेशम धागा जिले में बनने लगता- जिला गठन के बाद बलरामपुर रामानुजगंज जिले में रेशम धागा निकल सके इसके लिए परियोजना मद से  रिलिंग मशीन खरीदी कर महिलाओं को दी गई थी। परंतु जिले में रेशम धागा का उत्पादन अभी भी सपना है।

  

रिलीग मशीन सुधारने की नहीं हुई पहल- लाखों रुपए लागत से 16 रिलिंग मशीन तो खरीद ली गई जो शुरू से ही खराब थी परंतु इसे सुधारा जा सकता था परंतु सुधारने के लिए आज तक कोई पहल नहीं की गई जिसके कारण यह कबाड़ के रूप में तब्दील हो गई।