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हरतालिका वृत्त का किया महिलओ ने किया उद्दयापन
August 21, 2020 • Aankhen crime par • मध्यप्रदेश

हरतालिका वृत्त का किया महिलओ ने किया उद्दयापन

 खिरकिया  हरतालिका तीज व्रत । हर साल यह त्योहार भाद्रपद शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को मनाया जाता है। यह व्रत मुख्य रूप से सुहागन महिलाओं के लिए हैं। इस दिन महिलाएं अखंड सौभाग्य और सुखी वैवाहिक जीवन के लिए व्रत रखती हैं। इस व्रत में महिलाएं माता गौरी से सौभाग्यवती होने का आशीर्वाद मांगती हैं। इसलिए विवाहित महिलाओं के लिए यह व्रत बेहद ही महत्वपूर्ण माना जाता है। यह कठिन होता है, क्योंकि इस दिन महिलाएं निर्जला उपवास करती हैं। आइए जानते हैं 
हरतालिका तीज का महत्व, पूजा विधि, शुभ मुहूर्त और व्रत कथा.पूजा अर्चना करती है अनेक रंगों के और बिल्ब पत्र चढ़ाती है एक महिला साफ़ सुथरी 108बिल्बपत्र  अवश्य फल दूध दही घी शहद शक्कर इत्यादि से अभिषेक करतीं यह व्रत को महीलाए सामूहिक रूप से मिलकर करतीं हैं  किसी भी विद्वान पंडित आचार्य से पूजा कराईं जाती है यह व्रत आजीवन रखना पड़ता है और इसी तारतम्य में मीणा समाज छिपाबड के वार्ड नं 12 में आज इस व्रत का उद्यापन किया जा रहा है आचार्य श्री प्रमोद जी शर्मा के द्वारा जिसमें प्रेम बाई मीणा अनिता शांता बाई लीला बाई रूखमणी बाई मंजू सेवती बाई गुलाब बाई मीणा श्यामा बाई विश्वकर्मा  सभी महीलाओं एक लंबे समय से व्रत रख रहीं हैं गोपाल भाई मीणा के निवास पर एकत्रित हो पूजा हों गी पहली आरती शाम 7बजे दूसरी आरती 9बजे तीसरी आरती रात12बजे चोथी आरती 3बजे  और पांचवीं आरती  सुबह 5बजे आरती करके फिर विसर्जन किया जाता हैं बहते पानी में  रात भर महीलाए भजन भक्ति में लीन रहते हूए भगवान भोलेनाथ कि आराधना में लीन रहतीं हैं

हरतालिका तीज की पौराणिक कथा
हरतालिका का शाब्दिक अर्थ की बात करें तो यह दो शब्दों से मिलकर बना है हरत और आलिका, हरत का अर्थ होता है अपहरण और आलिका अर्थात् सहेली, इस संबंध में एक पौराणिक कथा मिलती है जिसके अनुसार पार्वती जी की सखियां उनका अपहरण करके जंगल में ले गई थी। ताकि पार्वती जी के पिता उनका विवाह इच्छा के विरुद्ध भगवान विष्णु से न कर दें। अपनी सखियों की सलाह से पार्वती जी ने घने वन में एक गुफा में भगवान शिव की अराधना की। भाद्रपद तृतीया शुक्ल के दिन हस्त नक्षत्र में पार्वती जी ने मिट्टी से शिवलिंग बनकर विधिवत पूजा की और रातभर जागरण किया। पार्वती जी के तप से खुश होकर भगवान शिव ने माता पार्वती को पत्नी के रूप में स्वीकार कर लिया था।